कबीरधाम जिले के जनजातीय बच्चों में पोषण स्तर: एक भौगोलिक अध्ययन

 

देवेन्द्रधर द्विवेदी, तामेश्वरी*

सहायक प्राध्यापक (भूगोल), शासकीय पं. जवाहर लाल नेहरू स्नातकोत्तर महाविद्यालय,

बेमेतरा, जिला-बेमेतरा, छत्तीसगढ़, भारत ।

*Corresponding Author E-mail: tkgeography20@gmail.com

 

ABSTRACT:

प्रस्तुत शोध पत्र में छत्तीसगढ़ के उत्तर-पश्चिम में स्थित मैकाल पर्वत श्रेणी में निवासरत विशेष पिछड़ी जनजाति ‘‘बैगा’’ बच्चों में पोषण स्तर को ध्यान में रखते हुए ‘‘आदिवसी बच्चों में पोषण स्तर का अध्ययन भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में किया गया है। किसी भी समुदाय के निवास, उसके विकास व अन्योन्य क्रियाओं के सम्पादन में भौगोलिक कारक महत्वपूर्ण होता है। कबीरधाम जिला छत्तीसगढ़ के बैगा आदिवासियों का प्रमुख निवास स्थान है। मैकाल श्रेणी में अवस्थिति होने के कारण ये राज्य के सुविधा सम्पन्न मैदानी भाग से दूर है। जिले में कई ऐसे सुविधाविहीन ग्राम है जहाँ पहुंचने के लिए पक्की सड़के नहीं है। केन्द्र व राज्य शासन के विभिन्न जनजातीय विकास कार्यक्रमों के फलस्वरूप शिक्षा एवं स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएँ अभी बैगा ग्रामों तक बहुत मुश्किल से पहुँच पाया है, जिसके कारण ये बैगा समुदाय अभी भी स्वास्थ्य एवं पोषण संबंधी समस्याओं से ग्रस्त है विशेषकर महिलाओं एवं बच्चों में पोषण की कमी है। अध्ययन प्रस्तुत अध्ययन में प्राथमिक एवं द्वितीयक आंकड़ों का प्रयोग किया गया है। प्राथमिक आंकड़ों के संकलन हेतु ऐसे बैगा परिवार जिनके घर में 06 माह से 05 वर्ष तक की आयु वाले बच्चे हैं, ऐसे कुल 30 परिवारों को उत्तरदाता के रूप में चयन किया गया है। कुपोषण स्तर की जांच करने के लिए MUAC (Mid-Uppar Arm Circulation) अर्थात् ऊपरी भुजा परिधि का प्रयोग किया गया है। शोध प्रविधि के अंतर्गत यह शोध पत्र निदानात्मक शोध प्ररचना के अंतर्गत है। अध्ययन के पश्चात् निष्कर्ष में यह प्राप्त हुआ कि इस समुदाय के बच्चों को गुणवत्तायुक्त आहार एवं पोषण प्रदान करने के उद्देश्य से सरकार द्वारा आंगनवाड़ी की सहायता से रेडी-टू-इट पावडर, गुड़-चना, फल्लीदाना चिक्की इत्यादि के माध्यम से पोषण देने का प्रयास किया जा रहा है। इसके बाद भी बैगा बच्चों को जन्म से पोषण संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि परिवारिक सदस्यों में विशेषकर बच्चों के माताओं की शिक्षा का स्तर निम्न है। निम्न शैक्षणिक स्तर से स्वास्थ्यगत् समस्याओं को समझने में कठिनाई होती है। बच्चों के अस्वस्थता के लक्षण को नहीं समझ पाती है और उपचार के स्थान पर अंधविश्वास के कारण झाड़फूंक इत्यादि पर विश्वास कर बैठती है। साथ ही परिवार के अन्य सदस्य निम्न आर्थिक स्थिति के कारण जीवकोपार्जन में संलग्न होते हैं, जिससे वे छोटे बच्चों के स्वास्थ्य एवं पोषण पर विशेष ध्यान नहीं दे पाते हैं, परिणामस्वरूप बच्चों की औसत ऊँचाई, वजन तथा बौद्धिक विकास व क्षमता प्रभावित होता है, उनका स्वास्थ्य और बौद्धिक स्तर अपेक्षाकृत निम्न होता है।

 

KEYWORDS: बैगा जनजाति, स्वास्थ्य एवं पोषण, कुपोषण, बाल पोषण, अंधविश्वास।

 

 


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भारत के ग्रामीण एवं आदिवासी महिलाओं व बच्चों में कुपोषण एवं रक्ताप्ता इत्यादि स्वास्थ्यगत समस्याएँ सामान्यतः पाया गया है। एक बेहतर जीवन-यापन करने के लिए आवश्यक पोषण से आदिवासी बच्चे दूर हैं। ‘‘भारत के लगभग 50 लाख कुपोषित आदिवासी बच्चों में 80 प्रतिशत छत्तीसगढ़, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तेलंगाना, गुजरात, झारखण्ड व मध्यप्रदेश जैसे जनजाति बहुल राज्य है। ये वह राज्य हैं जहाँ संवैवधानिक दृष्टिकोण से 5वीं अनुसूचि के अंतर्गत आते हैं, किन्तु उक्त राज्यों में भूमि हस्तांतरण, विस्थापन, अपर्याप्त मुआवजे का आवंटन हुआ है। परिणामस्वरूप आदिवासियों को आर्थिक एवं स्वास्थ्यगत समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ये बच्चे दैनिक पोषण जैसे प्रोटीन, ऊर्जा, विटामिन व खनिज-लवण आदि अल्पमात्रा में ही प्राप्त कर पाते हैं और कुपोषण के शिकार हो जाते हैं।’’1 ‘‘राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, विगत 05 वर्षों में एनीमिया में विशेष रूप से वृद्धि हुई है। NFHS-4 (2015-16) और NFHS-5 (2019-21) के मध्य एनिमिया से ग्रस्त आदिवासी बच्चों का प्रतिशत 29.7 से बढ़कर 80.5 प्रतिशत हुआ है।’’2 ‘‘इस प्रकार कुपोषण से आदिवासी बच्चों में ऐसा प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है जिससे इन्हें विभिन्न संक्रामक बीमारी यथा-निमोनिया, दस्त, मलेरिया, अल्प वजन, ऊँचाई अवरूद्ध होना इत्यादि समस्याओं का सामना करना पड़ता है।’’3 उक्त स्वास्थ्य समस्याओं को दृष्टिगत रखते हुए इन आदिवासी बच्चों की कुपोषण की स्थिति के मापन हेतु MUAC परीक्षण किया गया है। यह एक सरल माप है जो एक रंगीन टेप के माध्यम से चयनित बच्चों के ऊपरी भुजा को मापते हैं। इस टेप में अंकित रंग (लाल, पीला व हरा) बच्चों के पोषण स्तर को स्पष्ट करता है। इसे निम्न तालिका की सहायता से समझा जा सकता है-

 

क्र.

रंग

पोषण स्तर

कार्यवाही

1

लाल

गंभीर

चिकित्सीय आहार उपलब्ध कराने वाली निकटतम स्वास्थ्य सुविधा से सम्पर्क करना चाहिए।

2

पीला

मध्यम

निकटमत स्वास्थ्य या पोषण केन्द्र से सम्पर्क करना चाहिए जो पूरक आहार उपलब्ध कराता है।

3

हरा

स्वस्थ

देखभालकर्ता को स्वस्थ देखभाल एवं भोजन संबंधी प्रथाओं को जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

 

शोध साहित्य का पुनरावलोकन:

खान, इरशाद एवं नायक, जयंत कुमार (2016)4 ‘‘छत्तीसगढ़ के विशेष पिछड़ी जनजाति ‘‘पहाड़ी कोरवा’’ के बच्चों में कुपोषण की स्थिति: एक मानवमितीय अध्ययन’’ अपने शोध पत्र में 0-5 वर्ष तक के आदिवासी बच्चों का कुपोषण अत्यधिक मात्रा में पाया गया, जिसके कारण इन बच्चों के शारीरिक- मानसिक विकास अवरूद्ध हो हो रहा है। वहीं कुपोषण के कारण अन्य गंभीर एवं संक्रामक बीमारियों का सामना नहीं कर पाने के कारण शिशु मृत्यु दर में अधिक है।

 

मित्रा, मिताश्री एवं अन्य (2007)5 ‘‘छत्तीसगढ़ में कमार जनजाति के बच्चों में पोषण की स्थिति’’ अपने शोध में 4 से 12 वर्ष के आयु के 309 कमार बच्चों (161 लड़के और 148 लड़कियाँ) के मध्य पोषण की स्थिति का अध्ययन किया गया है। कमार जनजाति के बच्चों में कम वजन, बौनेपन और कमजोरी के रूप में कुपोषण और आहार (ऊर्जा एवं प्रोटीन) की कमी व्यापक रूप से पाई गई है। सुझाव के रूप शासन को समस्याओं की जांच और बच्चों में अच्छी पोषण स्थिति सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक पोषण तत्वों की पूर्ति करना आवश्यक है।

 

कांजीलाल, करण एवं अन्य (2010)6 ‘‘भारत में बच्चों की पोषण स्थिति: घरेलू सामाजिक- आर्थिक स्थिति संदर्भगत निर्धारक के रूप में’’ अने शोध पत्र में बाल कुपोषण में सामाजिक-आर्थिक असमानता की सीमा को मापने और बच्चों की पोषण स्थिति के संदर्भगत निर्धारक के रूप में घरेलू सामािजक-आर्थिक स्थिति को ज्ञात किया है, जिसमें बच्चों में बढ़ती कुपोषण प्रवृत्ति की कमी के कारण बच्चों में औसतन सामान्य से कम वजन, आयु अवरूद्ध तथा रोगप्रतिरोधक क्षमता का ह्रास होने से समस्याएँ आती है।

 

शोध का महत्व:

प्रकृति द्वारा प्रदत्त मानव समुदाय को अच्छा भोजन, स्वास्थ्य, उपचार तथा एक बेहतर जीवन जीने का अधिकार है। यह अध्ययन मानव भूगोल के तहत है, जिसमें बैगा आदिवासी में शिशु का कुपोषण एक चिंता का विषय है। शोधार्थी द्वारा बैगा जनजातियों एवं स्वास्थ्य विभाग का ध्यानाकर्षण करन का प्रयास किया गया है, ताकि बैगा समुदाय के निम्न स्वास्थ्य स्थिति के कारण अल्प जीवन- प्रत्याशा में सुधार किया जा सके तथा बच्चों के कुपोषण को दूर करने में स्वास्थ्य विभाग एवं बैगाओं को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक किया जा सके।

 

अध्ययन के उद्देश्य:

1.  बैगा आदिवासियों की आर्थिक एवं दैनिक जीवन की कार्यप्रणाली को ज्ञात करना।

2.  बैगा आदिवासी महिला व बच्चों की स्वास्थ्यगत स्थिति का अध्ययन करना।

3.  बैगा आदिवासियों के लिए स्वास्थ्य विभाग एवं बैगाओं में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता की स्थिति को ज्ञात करना।

 

उपकल्पना:

H0 बैगा आदिवासियों में पारंपरिक उपचार से स्वास्थ्य स्थिति अच्छी नहीं है।

H1 बैगा आदिवासियों में पारंपरिक उपचार से स्वास्थ्य स्थिति अच्छी है।

 

शोध पद्धति:

प्रस्तुत शोध कार्य में शोधार्थी द्वारा किये गये निदानात्मक शोध प्ररचना के अंतर्गत है। प्राथमिक आंकड़ों के संकलन हेतु साक्षात्कार अनुसूची व अवलोकन का प्रयोग किया गया है। तथा द्वितीयक आंकड़ों एवं प्रतिवेदनों के रूप में स्वास्थ्य विभाग, जिला-कबीरधाम, स्वास्थ्य जांच तालिका, स्थानीय समाचार पत्र, इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्रियों का प्रयोग किया गया है। उत्तरदाताओं का चयन दैव निदर्शन पद्धति के तहत् ग्रिड प्रणाली का प्रयोग करते हुए पांच बैगा बाहुल्य ग्रामों में प्रत्येक ग्राम से 06-06 बैगा परिवारों का चयन किया गया है। सभी बैगा परिवारों से 0-5 वर्ष के अंतर्गत 1 कुपोषित बच्चे का चयन कर उसकी माता से साक्षात्कार किया गया है।

 

अध्ययन क्षेत्र:

कबीरधाम जिला 21°32’ से 31°35’ उत्तरी अक्षांश तथा 80°48’ से 80°28’ पूर्वी देशांतर के मध्य स्थित है। जिले का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 1928 वर्ग किमी है।7 जिले का उत्तर-पश्चिम भाग पठारी तथा दक्षिण पूर्वी भाग मैदानी-पठारी है। यहाँ प्रमुख नदी के रूप में संकरी, बंजर, हॉप नदी है। जिले में लैटेराइट, लाल-पीली मिट्टी तथ जिले के पश्चिम भाग में काली मिट्टी की अधिकता है। यही कारण है कि इन क्षेत्रों में गन्ने का उत्पान अधिक होता है। यहाँ 2 शक्कर कारखाना (भोरमदेव व सरदार वल्लभभाई पटेल शक्कर कारखाना) स्थित है।

 

प्रमुख फसल धान, तुअर, चना, गन्ना व सोयाबीन है। मैकल पर्वत श्रेणी का पूर्वी हिस्सा होने के कारण यह एक वृष्टि छाया प्रदेश है, जिसके कारण यहाँ वर्षा कम होती है। वन सम्पदा भी यहाँ प्रचुर मात्रा में है, बांस, तेन्दुपत्ता, महुआ, चिरौंजी, लाख, गोन्द, जड़ी-बूटी इत्यादि।

 

जनगणना 2011 के अनुसार जिले में बैगा जनसंख्या 11,261 है (कुल बैगा का 45.80%) है। जिले में दो विकासखण्ड बोड़ला एवं पण्डरिया बैगा बहुल विकासखण्ड है।

 

तथ्यों का विश्लेषण:

अध्ययन क्षेत्र के उत्तरदाता माताओं से साक्षात्कार कर तथ्यों के संकलन पश्चात् तथ्यों का विश्लेषण अग्र तालिकाओं में किया गया है, जो इस प्रकार है-

 

तालिका क्रमाँक-01: बच्चों को प्रतिदिन पोषण युक्त भोजन मिलना

क्र.

अभिमत

संख्या

प्रतिशत

1

हाँ

9

30

2

नहीं

17

56.7

3

तटस्थ

4

13.3

योग

30

100

 

तालिका व आरेख से स्पष्ट है कि अध्ययन क्षेत्र के चयनित उत्तरदाता बच्चों के माताओं में से सर्वाधिक 56.7 प्रतिशत बच्चों के माताओं के अनुसार बच्चों को नियमित पोषणयुक्त भोजन नहीं मिल पाता है। 30.0 प्रतिशत उत्तरदाता बच्चों के माताओं ने बताया कि बच्चों को प्रतिदिन पोषण युक्त भोजन मिल रहा है, जबकि 13.3 प्रतिशत उत्तरदाता उक्त विचार से तटस्थ है। उपरोक्त विश्लेषण से ज्ञात होता है कि बैगा जनजाति परिवारों में माताओं व अन्य सदस्यों को ज्ञात ही नहीं है कि वे अपने बच्चों की बच्चों के भोजन में पोषणयुक्त आहार हेतु किन भोज्य पदार्थों को सम्मिलित करे।

 

तालिका क्रमाँक-02: उत्तरदाताओं के ग्राम में स्वास्थ्य विभाग द्वारा बच्चों के पोषण संबंधी जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन

क्र.

अभिमत

संख्या

प्रतिशत

1

हाँ

5

16.7

2

नहीं

16

53.3

3

कभी-कभी

6

20

4

तटस्थ

3

10

योग

 

30

100

 

तालिका व आरेख से स्पष्ट है कि अध्ययन क्षेत्र के चयनित उत्तरदाता बच्चों के माताओं में से सर्वाधिक 53.3 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने बताया कि उनके ग्राम में बच्चों के पोषण एवं स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता कार्यक्रमों और शिविरों का आयोजन नहीं होता है। 16.7 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने बताया कि उनके ग्राम में प्रत्येक वर्ष बच्चों के पोषण से संबंधित कार्यक्रमों का आयोजन नियमित किया जाता है, वहीं 20.0 प्रतिशत उत्तरदाता माताओं ने बताया कि उनके ग्राम में कभी-कभी पोषण संबंधी जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जबकि 10.0 प्रतिशत उत्तरदाता माताएँ उक्त विचार से तटस्थ है। उपरोक्त विश्लेषण से ज्ञात होता है कि अध्ययन क्षेत्र के बैगा आदिवासी क्षेत्रों/ग्रामों में बच्चों के पोषण एवं स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन नहीं हो पाता है जिसके कारण बैगा माताओं में बच्चों के स्वास्थ्य एवं पोषण से संबंधी जानकारी का अभाव है, जो बच्चों के कुपोषण का मुख्य कारण है।

 

उपकल्पना परीक्षण:

H0 बैगा आदिवासियों में पारंपरिक उपचार से स्वास्थ्य स्थिति अच्छी नहीं है।

H1 बैगा आदिवासियों में पारंपरिक उपचार से स्वास्थ्य स्थिति अच्छी है।

 

तालिका क्रमाँक-03: बैगा आदिवासियों में पारंपरिक उपचार से स्वास्थ्य स्थिति अच्छा होना

क्र.

अभिमत

संख्या

प्रतिशत

1

पूर्ण सहमत

4

13.3

2

सहमत

8

26.7

3

तटस्थ

3

10

4

असहमत

10

33.3

5

पूर्ण असहमत

5

16.7

योग

30

100

 

तालिका व आरेख से स्पष्ट है कि अध्ययन क्षेत्र के चयनित उत्तरदाता माताएँ ‘‘बैगा आदिवासियों में पारंपरिक उपचार से स्वास्थ्य स्थिति अच्छा होना’’ कथन के संदर्भ में चयनित माताओं में से सर्वाधिक 33.3 प्रतिशत उत्तरदाता असहमत एवं 16.7 प्रतिशत उत्तरदाता पूर्ण असहमत है। 26.7 प्रतिशत उत्तरदाता उक्त विचार से सहमत एवं 13.3 प्रतिशत उत्तरदाता पूर्ण सहमत है, जबकि 10.0 प्रतिशत उत्तरदाता उक्त विचार से तटस्थ है। इस प्रकार विश्लेषण से ज्ञात होता है कि अध्ययन क्षेत्र में बैगा जनजातियों के पारंपरिक चिकित्सा पद्धति बैगा जनजातियों के स्वास्थ्यगत समस्याओं का समाधान करता है, लेकिन उत्तरदाता माताओं के अनुसार यह चिकित्सा केवल वयस्क आयु वर्ग के लिए अधिक प्रभावकारी है, शिशुओं के स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से उपयुक्त नहीं है।

 

उक्त विचार से प्राप्त तथ्यों का काई वर्ग परीक्षण करने पर काई वर्ग का परिकल्पित मान 5.64 प्रतिशत है। स्वतंत्र कोटि (df) 2 का सार्थकता स्तर 0.10 पर सारणी मान 4.61 है, जो काई वर्ग के परिकल्पित मान 4.61< 5.64 से अधिक है अर्थात यह कहा जा सकता है कि बैगा आदिवासी बच्चों में कुपोषण स्तर एवं खान-पान आज भी स्वास्थ्य स्तर में सुधार में पारंपरिक स्वास्थ्य उपचार (जड़ी-बूटी) मिलेट, पोषणयुक्त भोजन पर्याप्त मात्रा में संतुलित ढंग से नहीं मिल पा रहा है, अतः आधुनिक चिकित्सा पद्धति के द्वारा इन बच्चों को पोषण प्रदान करने के आवश्यकता है, साथ ही बैगा जनजाति में स्वास्थ्य एवं पोषण के संदर्भ में जागरूक करने की आवश्यकता है ताकि वे स्वयं होकर अपने स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताओं के लिए पारंपरिक चिकित्सा के साथ-साथ आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों को अपना सके।

 

निष्कर्ष:

प्रस्तुत शोध ‘‘कबीरधाम जिले के जनजातीय बच्चों में पोषण स्तर: एक भौगोलिक अध्ययन’’ छत्तीसगढ़ राज्य के कबीरधाम जिले के बैगा जनजाति के संदर्भ में है। बैगा आदिवासी परिवारों में 6 माह से 5 वर्ष तक के मध्य बच्चों में कुपोषण की समस्या अधिक है। बैगा महिलाओं में खुन की कमी व गर्भावस्था के दौरान पोषणयुक्त संतुलित आहार नहीं मिल पाने के कारण गर्भस्थ शिशु को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता है, जो धीरे-धीरे कुपोषण का रूप ले लेता है। हालांकि शासन द्वारा इन्हें आंगनवाड़ी के माध्यम से पोषण संबंधित सभी योजनाओं की सहायता से अनेक प्रकार के पोषक आहार उपलब्ध कराया जा रहा है, जिसमें रेडी-टू-इट पावडर, गुड़ व चना, फल्ली व तिल की चिक्की इत्यादि। आंगनबाड़ी में पंजीकृत सभी बच्चों को पोषणयुक्त भोजन व दूध इत्यादि दिया जाता है। विशेष रूप से कुपोषित बच्चों के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों एवं जिला अस्पतालों में विशेष पोषण सत्र के माध्यम से पोषण प्रदान किया जा रहा है। शासन द्वारा अनेक प्रयास के बावजूद बैगा परिवारों में विशेष महिलाओं में शिक्षा की कमी व स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता नहीं है, जिसके कारण उन्हें शासन द्वारा संचालित योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। बैगा आदिवासी घने जंगलों मे रहना अधिक पसंद करते हैं जिसके कारण वे प्रकृति प्रेमी कहा जाता है, साथ ही ये जंगल में उपलब्ध विभिन्न प्रकार के जड़ी-बुटियों के जानकार होते हैं, जिससे इन्हें ‘‘मेडीसिन मेन’’ के नाम से भी जाना जाता है। ये प्राथमिक चिकित्सा के रूप में पांरपरिक रूप से अपने औषधि ज्ञान का प्रयोग कर उपचार करते हैं, जिससे वे अपेक्षाकृत कम बीमार होते हैं। आधुनिक चिकित्सा पद्धति की तुलना में उन्हें बच्चों के स्वास्थ्य से संबंधित ज्ञान नहीं हो पाता है जिससे सही उपचार नहीं मिलने से बच्चों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। राज्य के ग्रामीण एवं सुदूर अंचलों में भी आंगनबाड़ी व उप-स्वास्थ्य केन्द्रों व स्वास्थ्य शिविरों के माध्यम से जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है जिसका प्रत्यक्ष लाभ अब इन आदिवासी परिवारों को भी मिल रहा है, जिससे उनके स्वास्थ्य स्तर में सुधार दिखाई पड़ता है।

 

संदर्भ ग्रंथ सूची:

1.    आत्राम, विरशहा ‘‘आदिवासियों में कुपोषण की समस्या और कुपोषण के उपाय’’ ए.जी.पी.ई. द रॉयल गोण्डवाना रिसर्च जर्नल ऑफ हिस्ट्री, साइंस, इकोनॉमिक, पॉलिटिकल एवं सोशल साइंस, अंक-01, भाग-01, मार्च; 2019, पृ. 80-83.

2.    दीपाविन्ता, गीता नियोगी, 21 जनवरी, 2022, राजनांदगाँव, छत्तीसगढ़, 101reporters.com

3.    यादव, सी.पी., हुसैन, एस.एस.ए., पासी, एस. एवं शर्मा, ए. ‘‘भारत के सह-स्थानिक क्षेत्रों में मलेरिया और कुपोषण के बीच संबंध’’ बी.जे.एम.ग्लोबल हेल्थ, 08 जनवरी, 2023.

4.    खान, इरशाद एवं नायक, जयंत कुमार ‘‘छत्तीसगढ़ के विशेष पिछड़ी जनजाति ‘‘पहाड़ी कोरवा’’ के बच्चों में कुपोषण की स्थिति: एक मानवमितीय अध्ययन’’ इंटरनेशनल जर्नल ऑफ अप्लाइड रिसर्च, अंक-2, भाग-11, 2016, पृ. 312-316.

5.    मित्रा, मिताश्री, कुमार, पी. वी., चक्रवर्ती, एस. एवं भारती, प्रेमानन्द (2007) ‘‘छत्तीसगढ़ में कमार जनजाति के बच्चों में पोषण की स्थिति’’ इंडियन जर्नल ऑफ पीडियाट्रिक्स, खण्ड-74, 25 मई 2007, पृ. 381-384.

6.    कांजीलाल, करण एवं अन्य ‘‘भारत में बच्चों की पोषण स्थिति - घरेलू सामाजिक-आर्थिक स्थिति संदर्भगत निर्धारक के रूप में’’ अंतर्राष्ट्रीय जर्नल ऑफ इक्वालिटी हेल्थ; अगस्त, 2010. वेबसाइट https://pubmed.ncbi.nlm.gov

7.    बैगा विशेष पिछड़ी जनजाति का आधारभूत सर्वेक्षण प्रतिवेदन, आदिम जाति अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान, नवा रायपुर (छ.ग.) 2020, पृ. 14.

 

 

Received on 13.10.2025      Revised on 10.11.2025

Accepted on 02.12.2025      Published on 17.03.2026

Available online from March 20, 2026

Int. J. Ad. Social Sciences. 2026; 14(1):31-35.

DOI: 10.52711/2454-2679.2026.00008

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